बॉलीवुड डेस्क। ‘मौसम’, ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’, ‘उड़ता पंजाब’, ‘जब हैरी मेट सेजल’, ‘मनमर्जियां’ और ‘पंगा’ सहित कई फिल्मों में अपनी गायिकी का लोहा मनवाने के बाद शाहिद माल्या की आवाज में नया सॉन्ग ‘क्यों’ रिलीज हुआ है। इस गाने के अलावा शाहिद ने अपनी जिंदगी के उतार-चढ़ाव, करियर से जुड़ी कई बातें दैनिकभास्कर से साझा कीं।
'क्यों' गाने की क्या थीम है?
शाहिद: ''यह एक लव सॉन्ग है जिसमें हिंदू और मुस्लिम लड़के-लड़की की प्रेम कहानी दिखाई गई है। दोनों की मोहब्बत को उनका परिवार नहीं स्वीकारता और फिर दोनों की जिंदगी में क्या उतार-चढ़ाव आते हैं, यही खूबसूरत ढंग से दिखाया गया है। जब मेरे पास इस गाने का ऑफर आया तो मैं इंकार नहीं कर सका और झट से हां कर दी। ''
आपने फिल्म इंडस्ट्री में जगह बनाने के लिए लंबा संघर्ष किया?
शाहिद: ''जी हां, मैं श्रीगंगानगर, राजस्थान से हूं। पिताजी का नाम सलीम है और संगीत से उनका गहरा प्रेम है, वह मोहम्मद रफी के करीबी रहे, उनके असिस्टेंट भी थे। रफी साहब जब उनकी गायिकी सुनते थे तो उनकी तारीफ करते नहीं थकते थे, मैं उस वक्त काफी छोटा था, पापा सिंगर बनना चाहते थे लेकिन कई पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते ऐसा हो नहीं पाया, ऐसे में 2006 में जब मैंने भी संगीत की दुनिया में कदम रखने की सोची तो सिर्फ अकेले मैं ही नहीं पूरा परिवार मुम्बई आ गया। उस वक्त मन में एक ही बात थी कि पापा का अधूरा सपना पूरा करना है, मैं किसी भी तरह पापा का सपना पूरा करना चाहता था लेकिन यह सफ़र इतना आसान नहीं था। स्ट्रगल काफी लंबा चला, शुरुआत में कई स्टूडियो के चक्कर काटे लेकिन नाकामी हाथ लगी तब निराशा भी होती थी फिर धीरे-धीरे राहें खुलीं मैंने टीवी सीरियलों के लिए गाने गाए जैसे ‘कसौटी जिंदगी की’, ‘देवी’, ‘पृथ्वीराज चौहान’, ‘साईं बाबा’ आदि में गाता रहा। कुछ समय भजन-कीर्तन और होटलों में भी गाना गाकर गुजारा किया।''
स्ट्रगल के दौर में कैसे हौसला बनाए रखा?
शाहिद:''इस दौरान परिवार का तो भरपूर सहयोग मिला ही लेकिन दोस्तों ने भी खूब साथ दिया। जब भी उदास होता तो उनके सामने रफ़ी साहब के दुखभरे नगमे गाकर अपना मन हल्का कर लेता था। दोस्तों ने कभी मेरे गाने सुनने से इंकार नहीं किया और हमेशा यही कहते थे तू एक दिन बड़ा सिंगर बनेगा।''
कौन सा पल गेमचेंजर साबित हुआ?
शाहिद: ''एक फिल्म थी ‘किसान’ जो कि मेरे लिए गेमचेंजर साबित हुई। इस फिल्म में जैकी श्रॉफ, दीया मिर्जा जैसे स्टार्स थे, मुझे कुछ सेकंड्स का आलाप रिकॉर्ड करने के लिए बुलाया गया लेकिन मैंने म्यूजिक डायरेक्टर से मिन्नतें कीं कि अगर वो इजाजत दें तो आलाप के साथ चंद लाइनें भी सीन में डाली जा सकती हैं जिससे मेरा बॉलीवुड में सिंगिंग डेब्यू भी हो जाएगा,उन्होंने ऐसा करने से मना करते हुए कहा कि नहीं यार इतना वक्त नहीं है, गाना कौन लिखेगा, हम जल्द से जल्द इसे पूरा करके देना है तब मैंने उन्हें मनाया कि आप इजाज़त दें तो मैं कुछ लाइनें लिख सकता हूं तो उन्होंने मुझे 10 मिनट का वक्त दिया और कहा ठीक है, 10 मिनट में लिखकर ला सकते हो तो लाओ। मैं 15 मिनट में उनके पास कुछ लाइनें लिखकर पहुंचा और उन्हें सुनाईं। उन्होंने अपनी सीट से खड़े होकर मुझे गले लगा लिया और बोल पड़े-अरे यार तुम कहां थे और इस तरह मेरा फ़िल्मी सफर शुरू हुआ।इसके बाद शाहिद की फिल्म 'मौसम' में रब्बा मैं तो मर गया गाना गाया जो कि हिट साबित हुआ। इस गाने के लिए मुझे पंकज कपूर से भी तारीफ मिली थी।उन्होंने भी गाना सुनकर मुझे गले लगा लिया था।''
‘उड़ता पंजाब’ का गाना ‘इक कुड़ी’ भी आपके करियर के लिए मील का पत्थर साबित हुआ, उसकी सक्सेस ने आप पर कैसा असर डाला?
शाहिद: ''इसका सारा क्रेडिट अमित त्रिवेदी को जाता है। वह म्यूजिक में एक्सपेरिमेंट करने से घबराते नहीं हैं और साथ ही सिंगर्स को भी कुछ नया ट्राय करने के लिए प्रेरित करते हैं। ‘उड़ता पंजाब’ से पहले मैंने उनके लिए ‘लव शव ते चिकन खुराना’ के लिए सिंगिंग की थी, उस गाने में मेरी सिंगिंग से अमितजी प्रभावित हुए और फिर मुझे ‘इक कुड़ी’ गाने का मौका मिला। यह गाना सुनने में सिंपल लगता है लेकिन गाने में इतना आसान नहीं है। फिल्म में जो वर्जन मैंने गाया था वह शिव कुमार बतालवी के ओरिजिनल गाने से मिलता जुलता है।यह गाना मेरे दिल के बेहद करीब है।''
आज के दौर में एक्टर्स भी सिंगिंग में उतर चुके हैं, इससे प्लेबैक सिंगर्स को कोई खतरा महसूस होता है?
शाहिद:''नहीं खतरे जैसी बात नहीं, मेरा मानना है कि जिसे भी सिंगिंग का शौक हो, उसे गाने का मौका देने में कोई बुराई नहीं लेकिन एक बात कहना चाहूंगा कि एक्टर्स को भी तभी सिंगिंग करनी चाहिए जब उन्हें असल में सिंगिंग आती हो। ऑटो ट्यून और फिर नाम के लिए रिमिक्स पर लिपसिंक कर देने से सिंगिंग नहीं हो जाती।''
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